भगवान कृष्ण के बारे में रोचक बातें जो शायद आप नहीं जानते (lesser known and interesting things about God Krishna maybe you don’t know)

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हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥

कृष्ण भगवान विष्णु के 8वें अवतार माने जाते हैं। इनको अनेकों नामो से जाना जाता है (भगवान् श्री कृष्ण जी के 51 नाम और उन के अर्थ) जैसे कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि। इसका जन्म द्वापरयुग में अष्टमी तिथि के दिन हुआ था। “कृष्ण” मूलतः एक संस्कृत शब्द है, जो “काला”, “अंधेरा” या “गहरा नीला” का समानार्थी है। मैं आपको कृष्ण भगवान कुछ ऐसी बातें और कहानियाँ बताऊंगा जो शायद आपने सुनी या पढ़ी न हो।

क्या कृष्ण भगवान की 16108 पत्नियाँ थी?

आपने अक्सर सुना होगा कि कृष्ण भगवान की 16000 या 16108 पत्नियाँ थी। बात सही है। भगवान कृष्ण जी कि आठ प्रमुख रानियाँ थी जिन्हे अष्टभार्या कहा जाता है। उनके नाम है, रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा।
अब 8 पत्नियों के बाद भी, आखिर श्री कृष्ण की 16000 पत्नियाँ क्यों थी ? इसके पीछे एक कहानी है।

नरकासुर नामक दैत्य जो की प्रागज्योतिषपुर नगर का राजा था ने अपनी शक्ति से इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु आदि सभी देवताओं को परेशान कर दिया और संतों और महिलाओं पर भी अत्याचार करता था। उसने सोलह हजार एक सो राजकन्याओं को अपने बंदीगृह में कैद कर लिया था। उसके अत्याचारो के कारण देवता व ऋषिगण भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए। नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया तथा उन्हीं की सहायता से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर दिया। और उसके हरण कर लाई गईं 16,100 कन्याओं को श्रीकृष्ण ने मुक्त कर दिया।

ये सभी अपहृत नारियां थीं या फिर भय के कारण उपहार में दी गई थीं और किसी और माध्यम से उस कारागार में लाई गई थीं। वे सभी नरकासुर के द्वारा दुखी, अपमानित, लांछित और कलंकित थीं। सामाजिक मान्यताओं के चलते नरकासुर द्वारा बंधक बनकर रखी गई इन नारियों को कोई भी अपनाने को तैयार नहीं था। तब अंत में श्रीकृष्ण ने सभी को आश्रय दिया। ऐसी स्थिति में उन सभी कन्याओं ने श्रीकृष्ण को ही अपना सबकुछ मानते हुए उन्हें पति रूप में स्वीकार किया। उन सभी को श्रीकृष्ण अपने साथ द्वारिकापुरी ले आए। वहां वे सभी कन्याएं स्वतंत्रपूर्वक अपनी इच्छानुसार सम्मानपूर्वक द्वारका में रहती थी। महल में नहीं। वे सभी वहां भजन, कीर्तन, ईश्वर भक्ति आदि करके सुखपूर्वक रहती थीं।

कैसे श्री कृष्ण भगवान ने द्रयोधन को विजयी यज्ञ करने से रोक दिया

महाभारत के युद्ध से पहले द्रयोधन अपनी विजय को सुनिचित करने के लिए एक यज्ञ करना चाहता था। यज्ञ की तिथि तय करने के लिए उन्होंने सहदेव को तिथि सुझाने के लिए कहा। सहदेव ज्योतिष में एक बहुत ही ज्ञानी व्यक्ति था और वह दुर्योधन को मना नहीं कर सकता था। अतः उन्होंने दुर्योधन को अमावस्या के दिन यज्ञ करने को कहा। जब पांडवों और कृष्ण ने यह सुना तो वे परेशान हुए क्योंकि अमावस्या के दिन यज्ञ करना दुर्योधन की जीत की गारंटी होगी।

कृष्ण ने एक योजना बनायीं। उन्होंने वास्तविक अमावस्या के एक दिन पहले पितृ तर्पण (श्राद्ध) करना शुरू किया जो की अमावस्या को ही होता है। जब सूर्या और चंद्रा ने सुना कि कृष्ण तर्पण कर रहे हैं तो वह उनसे अगले दिन के बजाय उस दिन ऐसा करने के लिए स्पष्टीकरण मांगने आए। जिस पर कृष्ण ने बताया कि अमावस्या का दिन वह दिन होता है जब सूर्य और चंद्रमा एक साथ आते हैं, चूंकि सूर्य (सूर्य देव) और चंद्रमा (चंद्र देव) एक साथ कृष्ण से मिलने के लिए आ गए तो उसी दिन अमावस्या का दिन है ना
की अगले दिन। इस प्रकार दुर्योधन अगले दिन यज्ञ नहीं कर पाया।

जब अर्जुन और श्री कृष्ण के बीच हुआ युद्ध

आप में से बहुत लोगो को शायद पता नहीं होगा कि एक बार अर्जुन और श्री कृष्ण के बीच में भी युद्ध हुआ था। इसके पीछे की कहानी इस प्रकार है –

एक बार ऋषि गालव ध्यान पर बैठे हुए थे तभी आकाश से जा रहे चित्रसेन ने थूका और वह थूक ऋषि गालव पर गिरी। गालव ऋषि बहुत क्रोधित हुए और वे श्रीकृष्ण के पास गए और सारी कहानी उनके सामने रखी। कृष्ण ने चित्रसेन को 24 घंटे में मारने की प्रतिज्ञा ली। नारद जी को जब इस बात का पता चला तब वे सीधा चित्रसेन के पास पहुंचे और चित्रसेन को बताया की श्रीकृष्ण ने उसे मरने की प्रतिज्ञा ली है। वह ये सुनकर घबरा गया और मदद की गुहार लगाने लगा।

तब नारद जी ने उन्हें एक योजना बताई जिसके अनुसार चित्रसेन को यमुना तट पर जाना था और आधी रात को एक स्त्री के आने पर ज़ोर-ज़ोर से रोना था और जब तक वह स्त्री कष्ट दूर करने की प्रतिज्ञा नहीं ले लेती तब तक उसे कारण नहीं बताना है।

नारद जी ने फिर इंद्रप्रस्थ जा कर सुभद्रा से कहा कि अगर आज आधी रात को यमुना में स्नान किया तो पुण्य की प्राप्ती होगी। जब रात्रि में सुभद्रा अपनी सखियों के साथ यमुना किनारे पहुंची तो किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी। वे तीनों जल्दी से आवाज़ की तरफ को गयीं तो देखा चित्रसेन विलाप कर रहा है। सुभद्रा ने उससे वादा किया कि वह उसकी दुविधा से उसे अवश्य निकालेगी। इसके बाद जब चित्रसेन ने सारी कहानी सुभद्रा को बताई तो वह घबरा गई क्योंकि एक तरफ श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा थी और दूसरी तरफ अपनी प्रतिज्ञा। सुभद्रा चित्रसेन को लेकर इंद्रप्रस्थ आ गयी और अर्जुन को सारी कहानी बताई। अर्जुन ने बहुत सोच-विचार कर सुभद्रा को आश्वासन दिया की उसकी प्रतिज्ञा ज़रूर पूरी होगी।

यह सब नारद जी ने श्रीकृष्ण को जाकर बताया और युद्ध की तैयारी आरम्भ हो गयी। अर्जुन और कृष्ण के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया। इसे भगवान श्री कृष्ण के जीवन का सबसे भयानक द्वंद्व युद्ध कहा जाता है क्योकि श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से अर्जुन की ओर प्रहार किया और अर्जुन ने पाशुपतास्त्र छोड़ दिया। बाद में देवताओं के हस्तक्षेप से दोनों शांत हुए। भगवान शिव फिर श्रीकृष्ण के पास गए और कहा- राम सदा सेवक रुचि राखी। वेद, पुरान, लोक सब राखी। अर्थात भगवान तो अपने भक्तों की बात को आगे रख कर अपनी प्रतिज्ञा को भूल जाते हैं। श्रीकृष्ण ने ये सुन कर युद्ध पर विराम लगाया और अपनी प्रतिज्ञा त्याग दी।

यह देख ऋषि गालव क्रोधित हो गए और कहा कि मैं अभी इसी समय कृष्ण, अर्जुन, सुभद्रा और चित्रसेन को भस्म कर दूंगा। ऋषि ने अपने हाथ में जल लिया इतने में सुभद्रा बोली “मैं यदि कृष्ण की भक्त हूँ और अर्जुन के प्रति मेरा पत्नीधर्म पूर्ण है तो यह जल ऋषि के हाथ से पृथ्वी पर नहीं गिरेगा” ऋषि यह देख शर्मिंदा हुए और सभी से क्षमा मांगी।

कैसे हुई थी श्रीकृष्ण की मृत्यु

यह माना जाता है कि भगवान कृष्ण की मृत्यु के कारण कई अभिशाप थे। जिनमें से मुख्य कृष्ण पर गांधारी का अभिशाप था। महाभारत के युद्ध के बाद, जब दुर्याोधन का अंत हो गया, तो उसकी माता गांधारी बहुत दुःखी हो गई थी। वह अपने बेटे के शव पर शोक व्यक्त करने के लिए रणभूमि में गई थी। भगवान कृष्ण और पांडव भी उसके साथ गए थे। गांधारी अपने बेटों की मृत्यु से इतनी दुःखाी हुई कि उसने भगवान कृष्ण को अभिशाप दिया कि वह और उनका वंश 36 साल में गायब खत्म हो जाएगा। और दूसरा मुख्य अभिशाप ऋषि दुर्वासा का था-

एक बार दुर्वासा ऋषि द्वारका में एक अतिथि के रूप में आए थे और श्रीकृष्ण ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया और उनकी जरूरतों को पूरा किया। ऋषि ने भगवान से खीर मांगी। भगवान कृष्ण ने इसे ऋषि के लिए बनाया था। कुछ पीने के बाद ऋषि ने भगवान कृष्ण से कहा कि वे इस खीर को अपने पुरे शरीर पर लगाए। भगवान कृष्ण ने इसे अपने पूरे शरीर पर लगाया लेकिन अपने पैर पर नहीं लगाया। यह देखते ही दुर्वासा ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि उनका पैर कमजोर हो जाएगा। अन्य लेखों में कहा गया है कि उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया कि उसके शरीर के खीर के हिस्से अभेद्य हो जाएंगे।

गांधारी के अभिशाप अनुसार 36 साल बीत जाने के बाद, एक त्योहार पर, यादवों के बीच लड़ाई छिड़ गई और उन्होंने एक दूसरे को मार डाला। श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम ने तब योग का उपयोग कर अपने शरीर को त्याग दिया और भगवान कृष्ण जंगल में एक पेड़ के नीचे ध्यान करने लगे। उस समय भगवान पीपल के पेड़ के नीचे अपनी दाहिनी जाँघ पर बायाँ चरण रखकर बैठे हुए थे, उस समय उनका लाल-लाल तलवा रक्त कमल के समान चमक रहा था। शिकारी जारा ने कृष्ण के आंशिक रूप से दिखाई देने वाले बाएं पैर को हिरण के रूप में रख दिया, और एक तीर मार दिया, जिससे वह घातक रूप से घायल हो गया। जब वह पास आया, तब उसने देखा कि ‘ये तो चतुर्भुज पुरुष हैं।’ इसलिये अपराध के डर के मारे काँपने लगा और भगवान श्रीकृष्ण के चरणों पर सिर रखकर धरती पर गिर पड़ा। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी को बहाना बनाकर देह त्याग दी। लेकिन यह भी उनकी एक लीला ही थी। पौराणिक मान्यताओं अनुसार प्रभु ने त्रेता में राम के रूप में अवतार लेकर बाली को छुपकर तीर मारा था। कृष्णावतार के समय भगवान ने उसी बाली को जरा नामक बहेलिया बनाया और अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी बाली को दी थी।

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